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Wednesday, September 30, 2026

बातें रह जाती हैं

बातें रह जाती हैं चंद मुलाकाते रह जाती हैं

उम्र फिसल जाती है हाथों से 

बस यादें रह जाती हैं 


कुछ पुकार के नाम रह जाते हैं 

दोस्तों के बीच लगे ठहाके रह जाते हैं

अभी तो यहीं थे

कल ही तो मिले थे 

बस बातें रह जाती हैं 


कोई आँचल गीला सा रह जाता है

तन के कपड़े मन के बोल रह जाते हैं

एक अधूरी गुनगुनाई धुन

रह जाती है 

एक चश्मा एक रुमाल एक कलम रह जाती है

वक्त गुज़र जाता है 

एक रुकी सी घड़ी रह जाती है


उम्र फिसल जाती है हाथों से 

बस यादें रह जाती हैं 


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Friday, September 25, 2026

मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे लिए एक प्रश्नचिन्ह है।

 जब मेरा अस्तित्व ही एक प्रश्नचिन्ह हो।

तुम्हें सिर्फ दिखते हैं देह के कुछ हिस्से 

और तुम्हारा पूर्ण ब्रह्मांड 

उसी पर केन्द्रित रह जाता है।

कभी भोग्या कभी वस्तु कभी सम्मोहन का पात्र बना देते हो।

जिस देह से ईश्वर और पैगम्बर जन्मे 

अरस्तू से आइंस्टाइन तक, जिस देह ने गढ़े 

वही देह एक हाशिये पर मेरे परिचय को सरका देती है।

तुम्हारे लिए मेरा अस्तित्व एक जटिल प्रश्न है।

कभी मेरी भावनाएं तुम्हारे ओछेपन का निशाना बनती हैं 

मेरी दुःख मेरी पीड़ा तुम्हारे लिए परिहास का विषय है।

मेरी देह तुम्हारे लिए विकार वस्तु मात्र रह जाती है।

मेरी सफलता असफलता का मापदान बनती है यह देह 

तुम्हारी नज़रों से बचाऊँ या तुम्हारे मचलते हाथों से 

कितने पर्दे कितनी सांकले लगाऊँ अपनी देह के आगे 

कि तुम्हारी मचलती लालसा से छिपा सकूं अपनी देह।

जब मेरी देह, मेरा अस्तित्व ही एक प्रश्नचिन्ह हो।

बताओ कैसे कहाँ रखूँ अपनी देह 

कितने तालों में कितनी बंद सांकलो के पीछे 

जो ईश्वर को पाने का मार्ग तुम्हारे लिए सरल हो।

क्योंकि 

मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे लिए एक प्रश्नचिन्ह है।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, September 16, 2026

तुम्हें याद हो शायद

तुम्हें याद हो शायद 

एक फर्श था कुछ गुलाबी 

उसे कितना घिसा था 

एक पत्थर से हम दोनों ने

थोड़ा और चमकाने के लिए।


तुम्हें याद हो शायद

एक दीवार पर आटा घोल कर 

चिपका दिए थे लक्ष्मी गणेश 

और एक प्रार्थना 

लक्ष्मी जी सदा सहाय हों।


तुम्हें याद हो शायद

एक वो दरवाज़ा 

जिसके पीछे सीढ़ियां 

छत तक जाती थीं 

वहीं लटकता था 

एक नज़र बट्टू।।


तुम्हे याद हो शायद

एक छत थी जिस पर

 सफेद चादरें डाल

रात भर गिनते थे हम तारे।।


तुम्हें याद हो शायद

एक कुर्सी थी बाबा की

जिस पर झूल झूल 

 सारे सबक किए थे याद ।।


तुम्हें याद हो शायद

एक आखिरी दिवाली

जिस में हमने कर दी थी 

आसमान से ले कर धरती तक 

कितनी रोशनी ।।


तुम्हें याद हो शायद

एक वो  तुम्हारा आखिरी गीत 

जिसकी आवाज़ अब उस 

घर में ठहर सी गई है।।


तुम्हें याद हो शायद 

आगे जाने के लिए 

हम कितना कुछ 

पीछे छोड़ आए हैं ।।


तुम्हें याद हो शायद...


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Anuraag Verma

Tuesday, September 8, 2026

एक दर है जो छूटता नहीं

 एक दर है जो छूटता नहीं 

है एक पल जो बीतता नहीं 

वक़्त गुज़रता जाता है 

पर समय बीतता नहीं ।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं 

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं ।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं 

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं ।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

एक दर है जो छूटता नहीं है

 एक दर है जो छूटता नहीं है

है एक पल जो बीतता नहीं है

समय गुज़रता जाता है

पर समय बीतता नहीं है।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं है

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं है।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं है

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Sunday, February 8, 2026

इश्क़ पर वसंत आया है

 इश्क़ पर वसंत आया है 

तुम्हें साथ ले आया है


फूलों की गंध में 

मिल चुकी है तुम्हारे 

लौट आने की खुशबू 


पपीहे ने फिर तुम्हे 

पुकारा है 

तुम्हारी याद ने घर आंगन

महकाया है

तुम्हारे लौट आने का 

मौसम आया है


यह हवा ने फिर 

किवाड़ खटखटाएं है

तुम्हारी पदचाप सुनने को

सरसों के खेत 

लहराएं हैं

तुम्हारे आने का मौसम 

लौट आया है


गांव घर की गलियों में

रंग संवर आया है 

तुम्हें फिर 

फाल्गुन ने पैगाम 

भिजवाया है 

तुम्हारे लौटने का 

मौसम फिर आया है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, January 21, 2026

प्रश्न मत करो

 आस्था पर प्रश्न मत करो

हिल जाती है 

व्यवस्था पर प्रश्न मत करो

चरमरा जाती है

शासन पर प्रश्न मत करो

ढह जाता है

तंत्र पर प्रश्न ना करो 

टूट जाता है

संभाल कर रखो 

अपना पेट बार बार

भूख से बिलबिला जाता है।

आदत डाल लो

अब मरने की

प्रश्नों से आज भी सिंहासन

डोल जाता है।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Sunday, January 18, 2026

मेरे अस्तित्व के खांचे में

 मेरे व्यक्तित्व खांचे में

ईश्वर रंग भर रहा है

उसकी कूची पैनी है

चुभती है लेकिन रंग

सारे पक्के हैं 

आत्म में उतरते।

कभी लगता है रूंध रहा है

अपनी चाकी पर

और तपा रहा है 

अपनी ही आंच में 

मैं पक्की और पक्की 

होती जा रही हूं ।


पीड़ा शायद उसकी 

छैनी है 

यह मानते हुए 

मैं हर अनुभव जीती 

जाती हूं

उस पूर्णता की उम्मीद में 

जीवन के सब 

प्रहार झेलती जा रही हूं।


ईश्वर है ?नहीं है?

निरुत्तर हूं और 

कभी कभी बस यह 

उम्मीद ही जैसे ईश्वर है

मुझे हर उगता सूरज 

देखना है 

हर ढलते सूरज को विदा देनी है

और 

इसी पीड़ा में खुद को

तराशते हुए होम 

हो जाना है।।

यह मानते हुए कि

ईश्वर मेरे अस्तित्व के 

खांचे में रंग भर रहा है।


मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू

Sunday, January 11, 2026

प्रश्नोत्तर

 मैं पूछना चाहती हूं

नदी से क्यों चुप सी बहती है?

पूछना चाहती हूं पहाड़ से 

क्यों दर्प से तना है ?

पूछना है मुझे समुद्र से 

क्यों इतना बेचैन है?

ओर पूछना है इस धरती से 

क्यों सब सहती है?


पूछना तो मुझे यह भी है

ईश्वर से

निष्पक्ष क्यों नहीं है तुम्हारा न्याय?

किंतु परंतु से हट कर 

चुप है ईश्वर 

निरुत्तर खड़ा है 

एक स्वर्णद्वार के परे 

शायद अपनी ही कृति पर अचंभित 

अचकचाया सा प्रश्नों से बचता हुआ।

आखिर कहे भी तो क्या?

शायद उसने भी नहीं सोचा था 

सूर्य और चन्द्र के बीच 

मन का इतना गहन अंधेरा होगा।

और मैं

एक प्रश्न चिन्ह सी

हाशिए पर खड़ी हूं

निरुत्तर

निःतांत अकेली।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू