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Monday, December 24, 2012

सपनों में तुम आती हो


सपनों  में तुम आती
हो नित नई लोरी गाती हो
फिर क्यों हर सवेरे चाँद सी खो जाती हो
माँ क्यों मुझे तुम छोड़ जाती हो
नही चीन्हती  तुम्हे
पर ढूँढती   अवश्य हूँ हर चेहरे में
सोचती हूँ कभी तो आओगी
हौले सहलाओगी मुझे
या दोगी  कभी गालों  पर  भारी थपकी
तब माँ तुम्हारे स्पर्श से तुम्हे पहचान लूँगी
और तुम्हे जान लूँगी
कहो माँ ! क्यों तुमने दिया मुझे भुला
आश्रम की अम्मा कहती हैं
पड़ी मिली  था मैं भी उसी झूले में
जिसमे कल ही आई है प्रिया
और ऋचा  और कविता  भी मिले थे उन्हें उसी झूले में
कहो माँ क्यों छोड़ देते हैं लोग
हमें झूलो में ,कूड़े पर या मंदिरों में
कभी कभी कुछ जोड़े आते हैं
कहते हैं हम ही तुम्हारे माँ बाप हैं
और छांट कर उसी तरह
जैसे छांटते  हो गाय कोई
ले जाते हैं अपने साथ कहीं
पर अम्मा कहती हैं वे भले लोग हैं
देते हैं सहारा दीन अनाथों को
क्या माँ मुझे भी कभी कोई ले जाएगा
या तुम ही आओगी ?
संग अपने मुझे ले जाओगी
लोरी गा गा कर सँग अपने सुलाओगी
कहो माँ क्या सच तुम कभी आओगी ?
मुझे संग ले जाओगी ?
मनीषा

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