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Monday, February 26, 2024

जीवन घट

 इस जीवन घट के दर्पण में 

सिर्फ  तुम्हारा ही अक्स नज़र  आता है 

मेरे जीवनकी मरुस्थली में 

तुम 

एक वटवृक्ष से खड़े हो 

हर पल अपनी डालियों में समेटे 

प्यार कि छाया देते तुम 

जीवन मीत  का अहसास देते तुम 

खड़े हो 

गौर करती हूँ कभी तो लगता है 

इस जीवन सरिता का सागर तुम हो 

पर 

यात्रा अभी अधूरी है , 

मुझे अपने किनारों 

की तृषा मिटानी है 

औ' तुम्हे संसार में अमृत बरसाना है 

हम तय कर रहे हैं अपना अपना यह सफ़र 

इंतज़ार शायद लम्बा हो जाए 

हो सकता है सांझ हो जाए 

पर याद रखना 

हर रात सुबह का पैगाम होती है 

फिर सरिता को तो विलीन होना ही सागर में 

चाहे अमावस छ  जाए 

तुम इंतज़ार करना

 बहता पानी 

चट्टानों में भी  राह  खोज लेता है 

जानती हूँ तुम चाँद को देख कर बेसब्र हो जाओगे 

पर सुबह आने पर 

तुम्हारे चेहरे की धीर मुस्कान 

मेरे मन दर्पण में भी झलकेगी 

इस आसर संसार में 

वह  मूक मुस्कान 

जो तुम्हारी और मेरे आँखों में दमकेगी 

हमारे इस  मिलन का द्योतक होगी 

इसलिए साथी तुम इंतज़ार करना 

विश्वास करना 

मेरे आने का 

तुम में विलीन होने का 

तुम इंतज़ार करना 


मनीषा

Tuesday, February 20, 2024

आज भोर सूरज उगा है

 आज भोर सूरज उगा है

रक्तिम लालिमा लिए

कुछ अपराधी सा

स्वयं को दुत्कारता सा

शायद उदास है 

कल फिर एक मासूम झूल गया था

एक फंदे से ।

गुस्से में आ कर विरोध से उसने

स्कूल की बेंच तोड़ी थी

उसने पुकारा था 

मेरी तरफ देखो

मुझे सुनो

मैं अकेला हूं 

तन्हा हूं

शायद सबसे बुरा हूं

पर मेरी सुनो

सबको इजाज़त दे दी है तुमने 

बोर्ड में बैठने की

मुझे भी तो दो एक मौका ।

मेरी गलतियां उफ्फ

कैसे मेरी पीठ

पर कंटीली झाड़ियों सी उग आई हैं

मां की आंखे 

पिता के प्रश्न

कैसे होगा प्रायश्चित।

मेरी छोटी छोटी भूलें 

जंगल सी आज खड़ी हैं

मेरे सामने

मैं चिल्ला रहा हूं

मेरे साथी तुम मेरी आवाज़

क्यों नहीं सुनते।।

 आह! ये पीड़ा

मृत्यु आओ मुझे अपना लो।


कल एक जीवन हार गया

कड़े नियमों के आगे

पता नहीं था उस एक बेंच की कीमत

इतनी अनमोल थी।


अरे रोको कोई इसे

कोई तो कहो

इन आशाओं की बलिवेदी

पर खड़े इन मासूमों से...

सुनो बच्चों

तुम तोड़ दो सारे बेंच

फांद जाओ ये स्कूलों

की दीवारें

छू लो आसमां

और ये जो रस्सियां बुलाती हैं ना तुम्हे

बांधने को,फंदे बुनने को

उन्हें जला डालो

ग्लानि के हर पौधे को

कुचल डालो


सुनो बादलों को गरजते

देखो हवाओं को बदलते 

जीवन बड़ा है 

मृत्यु से कहीं अधिक विशाल

तुम आवाज देना 

ये नीला आसमां 

बहुत दूर तक फैला है

इसके नीचे तुम्हारे लिए भी है

एक जगह

चांद सी शीतल

नर्म सी 

सुनो मेरे बच्चे

मृत्य जब जब तुम्हें बुलाए

तुम जीवन को चुनना।।

अभी बहुत कुछ है 

जो जीने लायक है।।

तुम कल तक रुको तो 

देखोगे,

कल उगने वाला सूर्य 

सुनहला होगा 

रक्तिम लाल नहीं।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ़्तगू

Monday, February 19, 2024

शब्द आघात करते हैं

 

शब्द आघात करते हैं।

जलते हैं, कुढ़ते हैं

मन पर मूक प्रहार करते हैं।।


शब्द आघात करते हैं।।



चुभते हैं शूल से 

सीने में सिल से गड़ते हैं

अस्तित्व पर बेहिचक सवाल करते हैं।।


शब्द आघात करते हैं।।


घूमते हैं दिलो दिमाग पर

गूंजते हैं बिस्तर की सलवटों पर 

रात दिन बस परेशान करते हैं।।


शब्द आघात करते हैं।।


तुम्हारे शब्द बस अब 

बार बार वही सवाल करते हैं

मन पर प्रहार करते हैं

शब्द आघात करते हैं।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू