Pages

Sunday, December 16, 2012

रिश्तों के भंवर

अब तो हर काम अधूरा रहता है 
सब गैर ज़रूरी लगता है 
मेरे लिए कोई अब कहाँ कुछ करता है 
जो चाहिये खुद ही लाना पड़ता है 
सब्जी का थैला लौटते में भारी लगता है 
जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह 
अपना उपहार खुद ही ले आना पड़ता है 
आईने देखने की फुर्सत नहीं मिलती 
मेरे तिल पर कोई कविता लिखी नहीं मिलती 
हाथ की मेहंदी अब छूट चुकी है 
बसंती साड़ी का मौसम अब नहीं आता 
सावन मेरा मन नहीं महकाता 
जब जब पैरमे थकन चढ़ती है 
तेरी दी हुई पायल कहीं ख्याल में खनकती है 
आँख तक आते तो हैं पर छलकते नही हैं 
काम करते मेरे हाथ थकते नहीं है 
फिर भी खाली पल आ बैठते हैं 
तेरे सवाल अब चुभते नहीं है
तू वैरागी कवि बन भटकता है 
मेरे पाँव से रिश्तों के भंवर उतरते नहीं है

No comments:

Post a Comment