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Friday, September 23, 2022

गुमनाम याद

 मैं नहीं सोचती तुम्हें,

मन कांप जाता है,सोच कर ,

कैसे! हवा सा एक व्यक्तित्व

गुम हो गया देखते ही देखते।

अभी थे,अब नहीं हो

कहीं नहीं हो, धरा से आकाश तक

तुम्हें पुकार लें , खोज लें

तुम.... नहीं लौटोगे।

तुम्हे एक बार छूने , महसूस करने 

और सुनने की चाह लिए

जीवन रीत जाएगा,

लेकिन तुम नहीं आओगे।

इसलिए तुम्हें नहीं सोचती

लेकिन तुम हावी रहते हो,

और किसी ज़िद्दी सूर्य किरण से 

आ बैठते हो मन के अंधेरे कोनों में 

और चमकते दर्पण से,

मिला देते हो मुझे मेरी विगत स्मृतियों से।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Saturday, September 17, 2022

चल बटोही

 चल बटोही, पथ प्रतीक्षा रत है 

समेट ले बिखरे अर्थ,

और चल, पथ प्रतीक्षा रत है ।।

कम नहीं  होती 

पथ पर, क्लांत धूप ।

हर पड़ाव से बाँध ले थोड़ी छाँव 

और चल,

चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है ।।


मंज़िल कोई नहीं  तेरी,

कदमों  से लिपटी है बस 

अनुभव की कोरी धूल।

तू साथ ले चल सर्व कंटक फूल,

और चल, 

चल बटोही, पथ प्रतीक्षा रत है ।।


सृष्टि के प्रथम अहसास से 

अंतिम श:वास  तक,

चलना ही तो है जीवन ।

धर तू सिर  पर संबंधो की गठरी 

और चल,

चल बटोही, पथ प्रतीक्षा रत है ।।


निश्छल, निश्चिन्त तू चल,

गंतव्य कोई नही तेरा 

कर्म पथ ही बस  है प्रशस्त,

सांसो की  अंतिम माला तक 

चिता की अंतिम ज्वाला तक 

तुझे चलना है ।

तू चल,

चल बटोही, पथ प्रतीक्षा रत है।।


मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू

Friday, September 9, 2022

ढलती उम्र

 उम्र कुछ ढलने लगी है 

रफ्तार कदमों की थमने लगी है

उठ बैठ अब होती नहीं

चपलता अब सोहती नहीं

कहते हैं सब थोड़ा आराम करो

दिन भर मत इतना काम करो

मन को पंख अब भी लगे हैं

चाहतों की उड़ान अभी अधूरी है

रंग अभी जिंदगी के कैनवस पर भरने बाकी हैं

कैसे थाम लें अपनी उमंगों को

अभी तो जिंदगी की शाम बाकी है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ़्तगू 


Saturday, September 3, 2022

स्त्रियां

  स्त्रियां अजीब हैं!

सब कुछ गा देती हैं ।

स्त्रियों ने गाया,

बिछोह बाबुल के घर का,

बाबुल से शिकवा,

पति से नखरा ,

सासुल और नन्दी का ताना 

नई नवेली जच्चा का दर्द 

और गाया मां का ममत्व ।

उन्होंने गीतों में उकेर दिया,

अपना सूनापन, अपना प्यार 

और दुनिया सुनती रही 

उन्हें लोक गीतों में ।

ऐसे छिपा लिया स्त्रियों ने 

अपना दर्द और गा दिए

ब्याह, विदाई, मिलन,बिछोह, 

जच्चा बच्चा के गीत।

स्त्रियां गाती रहीं

चुपचाप रात में अंधेरे में,

चौके में चूल्हे पर,

कुओं और तलाबों पर,

ब्याह और शादी में।

उन्हें सबने सुना, 

लेकिन किसी ने सुना नहीं।

मनीषा वर्मा 

#गुफ़्तगू



तेरे जाने के बाद

 कभी कभी झांक लेती हूं झरोखों से 

अब हर आहट पर पर्दा, कुछ और सरका लेती हूं ।

कर देती हूं मजबूती से दरवाजे बंद,

कि तेरे जाने के बाद, भीतर आने की इजाज़त 

अब किसी को नहीं देती हूं।


खुल के नहीं हंसती है अब धूप, चौहद्दी पर

अंगूर की बेल अब नहीं फलती है।

हाथों से कस के बांध लेती हूं केश

कोई घटा अब कहीं नहीं बरसती है ।

कि तेरे जाने के बाद , कोई पदचाप

मन की इस देहरी पर नहीं ठहरती है।


एक सन्नाटा सा पसरा रहता है घर आंगन पर 

सूरज चांद अब नहीं उतरते हैं ।

आरती का दिया उदास पड़ा है तुलसी के नीचे,

कि तेरे जाने के बाद, कोई लौ

उम्मीद की इन आंखों में नहीं जलती है ।


मनीषा वर्मा


#गुफ़्तगू