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Wednesday, February 22, 2012

धरती ने कहा आकाश से


एक बार धरती ने कहा आकाश से
 मुझे अपना लो 
सितारों के इस जहान में बैठा लो
आकाश हंसा
दंभ से 
धरती की ओर झुका भी
पुलकित सी धरती दूर क्षितिज तक 
दौड़ती चली गई 
आकाश पाने को
तब आकाश पुनः हंसा 
और पहुँच गया एक नए छोर पर 
धरती फिर दौड़ी ,आकाश और ऊंचा उठा
और फिर एक दौड़ और फिर एक हंसी 
दौड़ और हंसी 
हंसी और दौड़
नए छोर नए क्षितिज खिंचते  चले गए
पाने में आकाश को धरती रही खुद को खोती
और आकाश निर्विकार रहा हंसता
उसकी पुलकों पर फिर भी रही धरती दौडती
पर, पर क्यों रही धरती दौड़ती ???
एक नई रचना एक नई संसृति जनमती रही दौड़ती 
धरती आकाश में लीन रह आकाश पाने को 

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