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Sunday, May 10, 2015

माँ जब आती थी



जाने कैसे करती थी 
माँ  आती थी तो 
मेरे एक कमरे को घर कर देती थी 
बिस्तर की मैली चादर धो देती थी 
मेरी कुरती  में सितारे जड़  देती थी 
जाने  कैसे करती थी 
जिसमे मुझको बरसों लगते हैं 
हर वो काम माँ  चुटकी में कर देती थी 
सूखी दाल रोटी में अजब स्वाद भर देती थी 
जाने कैसे करती थी 
कितने बड़ी पापड़ गुझिया से वो 
सारे खाली डिब्बे भर देती थी 
पापा से छिपा के मेरे बटुए में 
ढेर से रूपये धर देती थी 
जाने कैसे करती थी 
माँ जब होती थी तो
साँझ को घर जल्दी आने का मन में चाव भर देती थी
घर के द्वार पर हल्दी कुमकुम की थाप कर देती थी
पूजा घर तुलसी में मान भर देती थी
हर दिन को वह त्यौहार  कर देती थी
माँ जब आती थी
तो मेरे घर को मंदिर कर देती थी 
मनीषा 

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