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Monday, May 16, 2011

प्रतिक्रिया

डा कुमार विशवास कि कविता कुछ नसो मे ऐसी उतर गयी कि ये शब्द फूट पङे:

कैसे चलूँ तेरी ताल परआसमां तक मेरे पैरो के नीचे धरती बिछी है
तू उन्मुक्त आसमां का पंछी 
मेरे सिर से पाँव तक रिवाज़ों की बेडियाँ हैं,
तू अपने मन का रमता जोगी 
मेरी धडकन पर भी, कई सवाली पहरे है
तूने तो गीत लिख डाले अपने दिल की हर तड्प पर
जो मेरी खामोशियों मे दर्द है वो तेरे नग्मो मे हो नही सकता।
मैं तो मिट गई किसी कि आरज़ू भरी रातों मे,
जो मेरी शहनाईयो मे ज़हर था वो तेरी तन्हाइयो मे हो नही सकता।
आसान था मजनूँ के लिये पगला, दीवाना बन जाना
हर मीरा को वैराग का अधिकार मिल नहीं सकता
रिवायते कुछ दुनिया की कुछ फ़र्ज़ की मजबूरियाँ है
कैसे चलूँ तेरी ताल पर मेरे पैरो के नीचे धरती बिछी है
तू कवि है तेरे तरन्नुम मे सपनो की फ़ुलवारियाँ खिलती है
मेरे नसीब के आसमां को सितारे भी नसीब नही है
तू नाप आसमां की ऊंचाईयों को मेरे दिल को अब मचलने की आदत नही है
 मनीषा

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