जब मेरा अस्तित्व ही एक प्रश्नचिन्ह हो।
तुम्हें सिर्फ दिखते हैं देह के कुछ हिस्से
और तुम्हारा पूर्ण ब्रह्मांड
उसी पर केन्द्रित रह जाता है।
कभी भोग्या कभी वस्तु कभी सम्मोहन का पात्र बना देते हो।
जिस देह से ईश्वर और पैगम्बर जन्मे
अरस्तू से आइंस्टाइन तक, जिस देह ने गढ़े
वही देह एक हाशिये पर मेरे परिचय को सरका देती है।
तुम्हारे लिए मेरा अस्तित्व एक जटिल प्रश्न है।
कभी मेरी भावनाएं तुम्हारे ओछेपन का निशाना बनती हैं
मेरी दुःख मेरी पीड़ा तुम्हारे लिए परिहास का विषय है।
मेरी देह तुम्हारे लिए विकार वस्तु मात्र रह जाती है।
मेरी सफलता असफलता का मापदान बनती है यह देह
तुम्हारी नज़रों से बचाऊँ या तुम्हारे मचलते हाथों से
कितने पर्दे कितनी सांकले लगाऊँ अपनी देह के आगे
कि तुम्हारी मचलती लालसा से छिपा सकूं अपनी देह।
जब मेरी देह, मेरा अस्तित्व ही एक प्रश्नचिन्ह हो।
बताओ कैसे कहाँ रखूँ अपनी देह
कितने तालों में कितनी बंद सांकलो के पीछे
जो ईश्वर को पाने का मार्ग तुम्हारे लिए सरल हो।
क्योंकि
मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे लिए एक प्रश्नचिन्ह है।
मनीषा वर्मा
#गुफ्तगू
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