Pages

Wednesday, September 16, 2026

तुम्हें याद हो शायद

तुम्हें याद हो शायद 

एक फर्श था कुछ गुलाबी 

उसे कितना घिसा था 

एक पत्थर से हम दोनों ने

थोड़ा और चमकाने के लिए।


तुम्हें याद हो शायद

एक दीवार पर आटा घोल कर 

चिपका दिए थे लक्ष्मी गणेश 

और एक प्रार्थना 

लक्ष्मी जी सदा सहाय हों।


तुम्हें याद हो शायद

एक वो दरवाज़ा 

जिसके पीछे सीढ़ियां 

छत तक जाती थीं 

वहीं लटकता था 

एक नज़र बट्टू।।


तुम्हे याद हो शायद

एक छत थी जिस पर

 सफेद चादरें डाल

रात भर गिनते थे हम तारे।।


तुम्हें याद हो शायद

एक कुर्सी थी बाबा की

जिस पर झूल झूल 

 सारे सबक किए थे याद ।।


तुम्हें याद हो शायद

एक आखिरी दिवाली

जिस में हमने कर दी थी 

आसमान से ले कर धरती तक 

कितनी रोशनी ।।


तुम्हें याद हो शायद

एक वो  तुम्हारा आखिरी गीत 

जिसकी आवाज़ अब उस 

घर में ठहर सी गई है।।


तुम्हें याद हो शायद 

आगे जाने के लिए 

हम कितना कुछ 

पीछे छोड़ आए हैं ।।


तुम्हें याद हो शायद...


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Anuraag Verma

Tuesday, September 8, 2026

एक दर है जो छूटता नहीं

 एक दर है जो छूटता नहीं 

है एक पल जो बीतता नहीं 

वक़्त गुज़रता जाता है 

पर समय बीतता नहीं ।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं 

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं ।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं 

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं ।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

एक दर है जो छूटता नहीं है

 एक दर है जो छूटता नहीं है

है एक पल जो बीतता नहीं है

समय गुज़रता जाता है

पर समय बीतता नहीं है।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं है

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं है।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं है

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Sunday, February 8, 2026

इश्क़ पर वसंत आया है

 इश्क़ पर वसंत आया है 

तुम्हें साथ ले आया है


फूलों की गंध में 

मिल चुकी है तुम्हारे 

लौट आने की खुशबू 


पपीहे ने फिर तुम्हे 

पुकारा है 

तुम्हारी याद ने घर आंगन

महकाया है

तुम्हारे लौट आने का 

मौसम आया है


यह हवा ने फिर 

किवाड़ खटखटाएं है

तुम्हारी पदचाप सुनने को

सरसों के खेत 

लहराएं हैं

तुम्हारे आने का मौसम 

लौट आया है


गांव घर की गलियों में

रंग संवर आया है 

तुम्हें फिर 

फाल्गुन ने पैगाम 

भिजवाया है 

तुम्हारे लौटने का 

मौसम फिर आया है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, January 21, 2026

प्रश्न मत करो

 आस्था पर प्रश्न मत करो

हिल जाती है 

व्यवस्था पर प्रश्न मत करो

चरमरा जाती है

शासन पर प्रश्न मत करो

ढह जाता है

तंत्र पर प्रश्न ना करो 

टूट जाता है

संभाल कर रखो 

अपना पेट बार बार

भूख से बिलबिला जाता है।

आदत डाल लो

अब मरने की

प्रश्नों से आज भी सिंहासन

डोल जाता है।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Sunday, January 18, 2026

मेरे अस्तित्व के खांचे में

 मेरे व्यक्तित्व खांचे में

ईश्वर रंग भर रहा है

उसकी कूची पैनी है

चुभती है लेकिन रंग

सारे पक्के हैं 

आत्म में उतरते।

कभी लगता है रूंध रहा है

अपनी चाकी पर

और तपा रहा है 

अपनी ही आंच में 

मैं पक्की और पक्की 

होती जा रही हूं ।


पीड़ा शायद उसकी 

छैनी है 

यह मानते हुए 

मैं हर अनुभव जीती 

जाती हूं

उस पूर्णता की उम्मीद में 

जीवन के सब 

प्रहार झेलती जा रही हूं।


ईश्वर है ?नहीं है?

निरुत्तर हूं और 

कभी कभी बस यह 

उम्मीद ही जैसे ईश्वर है

मुझे हर उगता सूरज 

देखना है 

हर ढलते सूरज को विदा देनी है

और 

इसी पीड़ा में खुद को

तराशते हुए होम 

हो जाना है।।

यह मानते हुए कि

ईश्वर मेरे अस्तित्व के 

खांचे में रंग भर रहा है।


मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू

Sunday, January 11, 2026

प्रश्नोत्तर

 मैं पूछना चाहती हूं

नदी से क्यों चुप सी बहती है?

पूछना चाहती हूं पहाड़ से 

क्यों दर्प से तना है ?

पूछना है मुझे समुद्र से 

क्यों इतना बेचैन है?

ओर पूछना है इस धरती से 

क्यों सब सहती है?


पूछना तो मुझे यह भी है

ईश्वर से

निष्पक्ष क्यों नहीं है तुम्हारा न्याय?

किंतु परंतु से हट कर 

चुप है ईश्वर 

निरुत्तर खड़ा है 

एक स्वर्णद्वार के परे 

शायद अपनी ही कृति पर अचंभित 

अचकचाया सा प्रश्नों से बचता हुआ।

आखिर कहे भी तो क्या?

शायद उसने भी नहीं सोचा था 

सूर्य और चन्द्र के बीच 

मन का इतना गहन अंधेरा होगा।

और मैं

एक प्रश्न चिन्ह सी

हाशिए पर खड़ी हूं

निरुत्तर

निःतांत अकेली।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Monday, December 29, 2025

मुझे तो चलना ही है अकेले ही

 मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले  ही 

तुमने क्योंकर पुकार लिया यूँही 

किसी अतीत के कोने से आकर दे दी दस्तक 

मेरे मन के अंधेरो पर अपने उजालों  की 


मेरे बिखरे मन को तुम आज क्यों समेटना चाहते हो 

अपने वक्ष में क्यों मेरा वजूद बसाना चाहते हो 

क्यों जकड़ना चाहते हो मुझे अपने बाज़ुओं में 

मैं तो रो ही रही थी बरसों से हर बरसात में 

तुम किसलिए  अब मुझे अपना कांधा  देना चाहते हो 

ओ! आनेवाले अजनबी तुम क्यों मुझसे परिचित होना चाहते हो 

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले 

तुम क्यों मेरा साथ देना चाहते हो 


लौट जाओ , 

यहाँ बहुत कंटक है मन के भीतर 

इनमे कैसे फूल खिलेंगे

मन में जो अब संवरते नही उन बेरंग मौसमों में कैसे रंग भरेंगे 

तुम  थाम  तो रहे हो मेरा हाथ हम कैसे संग चलेंगे 

तुम्हारे रास्तों पर फुलवारियां है 

मेरे रास्ते बीहड़ो की ओर जातें  हैं 

तुम लौट जाओ यहीं से 

मेरे पास पाने को कुछ भी नही है 

और तुम्हारे पास खोने को है बहुत कुछ 

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले 

मनीषा

कितनी नफरतें बो रहे हैं

कितनी नफरतें बो रहे हैं 

कौन सी फसल काटेंगे ?


वे बेनाम लोग 

वेश बदल बदल कर 

इस ज़मीं पर गिरा हुआ

सिर्फ लहू मांगेंगे।।


चीख चीख कर

मचा देंगे ये कोहराम

तुमसे सिर्फ तुम्हारी

चुप्पी मांगेंगे ।।


इनके हाथों में हैं

खंजर और दारातियां 

तुम्हारे सीने में 

यह डर उतारेंगे।।


कर देंगे हवा ज़हरीली 

पानी में विष मिला देंगे 

तुमसे यह सिर्फ 

झुके सिर मांगेंगे।।


दाम दे कर खरीद लेंगे 

वो सारे नामानिगार 

वो भर भर कर पुलिंदे 

झूठ बाँचेंगे।।


उजाड़ कर तुम्हारे खेत

और तुम्हारी बस्तियां

तुमसे ही तुम्हारी 

पहचान मांगेंगे 


तुम इन आंधियों 

के बीच दीप सा जलना

तोड़ कर चुप्पी

प्रेम और प्रीत लिखना।।


उठा कर शीश

अपने डर से मिलना

अपनी हिम्मत 

अपने लहू से

अपनी वर्जना लिखना।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ़्तगू

Monday, December 22, 2025

आज मन बेहद उदास है

 आज मन बेहद उदास है

शायद कोई ख़्याल आस पास है

मन को रूँधू तो शायद बताए 

किस कमी का यह अहसास है।।


मौसम भी बुझा बुझा सा है

साल की उम्र भी ढल सी गई है

हवा में घुला एक खुश्क सा पैगाम है

बेतरतीब सा इस रात का मिजाज़ है।।

आज मन बेहद उदास है

मनीषा वर्मा

#गुफ्तगू




मैं कुछ देर आंखे बंद कर के तुम्हें सोचना चाहती हूं

 मैं कुछ देर आंखे बंद कर के तुम्हें सोचना चाहती हूं 

मन ही मन मुस्काते कुछ गुनगुनाना चाहती हूं 

खिड़की से जो चांद नज़र नहीं आता

उसी की चांदनी में तुम्हें पाना चाहती हूं

कभी तुमसे रूठना कभी तुम पर इतराना चाहती हूं

 यह हमारे बीच आए तहज़ीबो और दायरों के फासले 

मिटाना चाहती हूँ

बस कुछ देर आँखें मूंदने से पहले 

एक बार फिर तुम्हें तुम ही से चुराना चाहती हूँ

मैं कुछ देर तुम्हें सोचना चाहती हूं।।

यह एक पल इतना मुश्किल होगा कभी

इस बात पर गौर करना चाहती हूं

इक उम्र में बस यही था मेरा काम

दिन रात बस तुम्हें ले कर ओढ़ना बिछाना

अपनी हथेलियों पर तुम्हारा नाम लिख कर 

बंद मुट्ठी में तुम्हें संग साथ ले आना 

आज बस उसी एक पल में लौटना चाहती हूँ 

बस कुछ देर आँखें मूंदने से पहले 

एक बार तुम्हें सोचना चाहती हूँ 

तुम्हारे  और मेरे नाम के वो दो अक्षर 

सहेजकर बस एक बार फिर पुकारना चाहती हूं।

मैं कुछ देर तुम्हें सोचना चाहती हूं।।

मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू


Tuesday, December 9, 2025

कोई इस कदर रंजीदा नहीं होता।।

 कुछ तो मजबूरियां रही होंगी उसकी

यूं ही कोई इस कदर रंजीदा नहीं होता।।


गिला उसका भी ठीक ही था मुझसे 

मैं क्यों किसी बात पर संजीदा नहीं होता।।


ग़फ़लत में अधूरा रह गया इश्क़ का फ़साना,

हम समझते रहे, वो हमसे ख़फ़ा नहीं होता।।


जानकर दूरियाँ बढ़ा लीं होंगी उसने,

वरना यूँ ही तो वो जुदा नहीं होता।।


चेहरे से तबियत पहचान लेते अगर 

समझते, कोई अपना हो कर भी अपना नहीं होता।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ़्तगू

Thursday, November 27, 2025

मेरी कूची के सब रंग फीके

 मेरी कूची के सब रंग फीके

मेरे गीतों के बोल अधूरे
हर क्षण हर पल मिलती खुशी अधूरी
तुम से ये कैसी जन्म जन्म की दूरी।।
कुछ कह पाती कुछ सुन पाती
काल के बंधन की यह कैसी मजबूरी
मन को मिलता ना कोई दिलासा
जीवन अब कोई ठौर ना पाता
तुम से ये कैसी जन्म जन्म की दूरी।।
धर्म ग्रंथ सब देते झूठा दिलासा
कहते है जन्म जन्म का नाता
नादान मन यह समझ ना पाता
दिन दिन कटता सूना सूना
रात मिट्टी मिट्टी हो जाती
मेरी हर मुस्कान रह जाती अधूरी
तुम से यह कैसी जन्म जन्म की दूरी।।
मनीषा वर्मा



वो एक पल था

 वो एक पल था

सभी दिनों से अधिक भारी
वक्त कुछ रुका रुका सा था
समय की गति थम सी गई थी
सांसों की लय टूट रही थी
जीवन की डोर छूट सी रही थी।।
बहुत लंबा दिन था
बहुत गहरी रात थी
ना मशीनों का शोर था
ना आसपास कोई हलचल
एक पूर्णविराम सा हो जैसे
लग रहा किसी कथा के अंत में ।।
वो एक पल बस पूरे जीवन पर
भारी है
समय वहीं आज भी रुका सा है
इन राहों पर मेरा साया जुदा सा है
मेरी कहानी का एक पन्ना कोरा सा है
कैसे इति श्री लिखूं जीवन के महाकाव्य पर
इसका एक सिरा अधूरा सा है।।
मनीषा वर्मा

तुम जब भी लिखना सतरंगी प्रीत लिखना।।

 वो लिख रहें है नफरतें तो लिखते रहें

तुम जब भी लिखना सतरंगी प्रीत लिखना।।
बहुत भारी है बोझ झूठे अंहकार का
तुम जब भी झुकना सादर नमन करना
रक्तिम स्याही से भी तुम सिर्फ धरा के गान लिखना
वो मिटा रहें है जो भी है यहां जीने लायक
तुम सदा शांति, अमन, प्रेम लिखना
उनके धमाकों के बीच प्राण वीणा की लय लिखना
बहुत आसान है उनसे बैर करना
तुम विवादों के बीच अपवाद लिखना
तुम जब भी लिखना सतरंगी प्रीत लिखना
मनीषा वर्मा

Thursday, November 13, 2025

हम थे क्या और क्या हो गए

 

हम थे क्या और क्या हो गए
इस बड़े से आसमां में खो गए।।

गिनते बैठे सिक्के  वक्त बेवक्त
इस  भरे बाजार में तन्हा हो गए।।

इतना रोए तेरे जाने के बाद
अब आंसू भी सूख कर ख़ाक हो गए।

बसा ली हैं इतनी दूर बस्तियां
अपने ही गली कूचे में सब गैर हो गए।।

ना था ना है कोई अपना खैरख्वाह
अपने आंगन के दरख़्त भी बाड़ हो गए।।

मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू 

Sunday, November 9, 2025

जी मैं झूठ बेचता हूं

 जी मैं झूठ बेचता हूँ

साफ सुंदर लचीले झूठ बेचता हूं।।

सबके काम आएं जो वह करामात बेचता हूँ

जी मैं झूठ बेचता हूँ।


सत्ता की कुर्सी हो 

या नौकरी की अर्जी हो

आइने से साफ, सफेदपोश 

झूठ बेचता हूं।।


रोटी की हो गुहार 

या हो बीवी की दरकार 

छोटे से बड़े या बड़े से बड़े 

सबके काम आएं ऐसे 

झूठ बेचता हूं।।


आंकड़ों से नाप लीजिए 

किसी तराज़ू में तौल लीजिए

विश्वास अंधविश्वास के उस पार 

जो निभ जाएं ऐसे विचार बेचता हूं

जी मैं एक दम शुद्ध झूठ बेचता हूँ।।


जी आपको सच की है दरकार ?

यह क्या मांग बैठे आप सरकार?

आज कल उसे कौन पूछता है ?

उसका एक  फूटी कौड़ी भी नहीं मिलता दाम।।


क्या बात कर रहे हुज़ूर 

खिला खिला चुनावी मौसम है 

आप तो या लीजिए नए वादों

अ अ ...मतलब जी नए झूठों का पुलिंदा।।


इस बार फिर जीत जाएंगे आप 

बना लीजिएगा नई सरकार 

खड़े कर लीजिएगा एक दो बंगले

 ले लीजिए नई चमकती मोटर कार ।।


जी लीजिए  सुंदर सजीले झूठ 

एक पर दो मुफ्त 

पहुंचिएगा सीधा संसद

सच तो है घाटे का सौदा।।


सच बस यही कहता हूं

जी मैं नहीं करता सच का व्यापार 

जिसकी किसी को नहीं है दरकार 

जी मैं सिर्फ विशुद्ध झूठ बेचता हूं।।


मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू

Friday, August 8, 2025

बड़े साहब से अर्ज़ी

 बड़े साहब से अर्ज़ी 

आप हुक्मरान हैं मालिक हैं 

आपकी कलम में बहुत ताकत है साब

एक हस्ताक्षर पर 

कितनी ज़िंदगियां टिकी हैं 

एक गुज़ारिश है साब

कलम को स्याही में डुबोइए 

रक्त में नहीं

दुआ मिलेगी साब 

आह नहीं

कल आपकी कलम ने

कितनी नौकरियां छीन ली

एक आदेश पर कितने घर संकट में आ गए

वो जो आपको गर्म चाय देता है ना हुज़ूर 

उसकी बीबी का आठवां महीना है पहला बच्चा है

अगले माह से बहुत खर्चा है

वो जिसे आप कभी कभार बुला कर 

बंगला साफ करवाते हैं ना 

उसका बेटा  अंग्रेजी स्कूल में है

सपना देखता है रॉकेट बनाने का

उसकी फीस जानी है साब तीन माह की 

आपके दिए कुल 22 हजार में से 

महीने का राशन भी लाना है, किराया भरना है

साब उम्र ज्यादा है उसकी 

आदेश पाने के बाद 

कई रात से  इसी चिंता में सोया नहीं है 

उसे अब कौन नौकरी देगा साब।। 

कई मातहत बहुत दूर से आते हैं

 कोई कोई तो मेरठ से सुबह 6 बजे की स्पेशल से 

ढाई तीन घंटे के सफर से आते हैं 

एक दम टाइम पर दफ्तर 

चाहे तो मशीन देख लीजिए साहिब

छोटा मोटा काम करते हैं सब 

किसी तरह इस बड़े शहर के अहसान तले 

अपने छोटे छोटे सपने पूरे कर रहे हैं

नौकरी ना छीनिए इनकी हुजूर 

उम्र हुए दफ्तर में सेवा करते कहां जाएंगे।


आप बड़े लोग हैं 

बहुत ताकत है आपकी कलम में

बहुत पढ़े लिखे हैं 

क्या जाने कहां आप बम गिरा दें 

कितने लोगों को खाने की पंक्ति में

खड़े खड़े गोली से भुनवा दें 

आज ही कहीं बुलडोजर चलवा दें 

किसी भी परिवार को कब मिट्टी में मिलवा दें

आप पढ़े लिखे प्रतिष्ठित भले मानुस हैं साब 

हम छोटे लोग हैं धरती के कीड़े मकोड़ों जैसे 

हमारा जानते हैं कोई मोल नहीं

इसलिए बस विनती है साब थोड़ा दीन दिखा दें 

आपकी कलम में बहुत ताकत है साब

एक गुज़ारिश है साब

कलम को स्याही में डुबोइए 

रक्त में नहीं

दुआ मिलेगी साब 

आह नहीं


मनीषा वर्मा

#गुफ्तगू

Tuesday, August 5, 2025

तुम सिर्फ स्त्री हो

 सपने मत देखो

सपनों पर पहरे होते हैं।

तुम भूल क्यों जाती हो?,

तुम सिर्फ स्त्री हो

तुम में अपेक्षाएं, महत्त्वकांक्षाऐं

 अच्छी नहीं लगतीं।

तुम चुप बहुत अच्छी लगती हो।

बहुत सुंदर , अपने रूप को संवारो

अरे! नहीं, ये क्या कह गई मैं, 

रुको, ज़रा पूछ लो उस से पहले 

इजाज़त है तुम्हे क्या, संवरने की भी?


नहीं तुम तो विरह वेदना में 

व्याकुल भी नहीं हो सकती 

जाने किस की नज़र पड़ जाए ।

तुम ना चारदीवारी में ही अच्छी हो

ओह! भूल गई वहां भी कहां

नज़र ही तो है वो तो सात परदे भेद कर भी

तुम तक पहुंच जाएगी।

कभी प्रश्न करेगी तो कभी हिंसा

तुम्हे तो इजाज़त नहीं है बोलने की

तुम सुनो, चुप ही अच्छी लगती हो।


तुम बहुत अच्छी लगती हो कविताओं में,

उपन्यासों में, रचनाओं में, यादों में ,

तुम वहीं रहो, बाहर मत निकलना ।

 तुम वहीं अच्छी लगती हो।

सुनो, तुम चुप बहुत अच्छी लगती हो।


मनीषा वर्मा 


#गुफ्तगू

Thursday, May 22, 2025

यह भीड़ है

 ना सुनती है 

ना कहती है

यह भीड़ है

खामोशी से 

सिर झुका कर 

पीछे पीछे

चलती है।


आवाज़ गुम है 

आंखे पथरा चुकीं

कान बंद हैं

और पड़ चुके हैं

अक्ल पर-पत्थर

शून्य है हवा में 

जहां यह बहती है।


यह भीड़ है

आज्ञाकारी शिशु सी 

बस पीछे पीछे 

चलती है।


उगता सूर्य 

जंगलों के पीछे कैद है

डूबता सूरज 

रोटी में ढल चुका 

श्वासों को पहरे में रखती है

बेतुके सवालों में 

उलझती है 


यह भीड़ है 

बिना बात के 

कभी भी भड़कती है 

अन्यथा 

चुप चाप एक दूजे 

के पीछे पीछे 

बस चलती है।।


मनीषा वर्मा

#गुफ्तगू