तुम्हें याद हो शायद
एक फर्श था कुछ गुलाबी
उसे कितना घिसा था
एक पत्थर से हम दोनों ने
थोड़ा और चमकाने के लिए।
तुम्हें याद हो शायद
एक दीवार पर आटा घोल कर
चिपका दिए थे लक्ष्मी गणेश
और एक प्रार्थना
लक्ष्मी जी सदा सहाय हों।
तुम्हें याद हो शायद
एक वो दरवाज़ा
जिसके पीछे सीढ़ियां
छत तक जाती थीं
वहीं लटकता था
एक नज़र बट्टू।।
तुम्हे याद हो शायद
एक छत थी जिस पर
सफेद चादरें डाल
रात भर गिनते थे हम तारे।।
तुम्हें याद हो शायद
एक कुर्सी थी बाबा की
जिस पर झूल झूल
सारे सबक किए थे याद ।।
तुम्हें याद हो शायद
एक आखिरी दिवाली
जिस में हमने कर दी थी
आसमान से ले कर धरती तक
कितनी रोशनी ।।
तुम्हें याद हो शायद
एक वो तुम्हारा आखिरी गीत
जिसकी आवाज़ अब उस
घर में ठहर सी गई है।।
तुम्हें याद हो शायद
आगे जाने के लिए
हम कितना कुछ
पीछे छोड़ आए हैं ।।
तुम्हें याद हो शायद...
मनीषा वर्मा
#गुफ्तगू
Anuraag Verma
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