एक दर है जो छूटता नहीं
है एक पल जो बीतता नहीं
वक़्त गुज़रता जाता है
पर समय बीतता नहीं ।।
उसी मुहाने पर खड़े हैं
जहाँ से कोई गुजरता नहीं
कोई बात तो है सबके ज़हन में
पर कोई पूछता नहीं ।।
इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है
कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं
तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर
कोई यहां अब अपना लगता नहीं ।।
मनीषा वर्मा
#गुफ्तगू