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Tuesday, September 8, 2026

एक दर है जो छूटता नहीं

 एक दर है जो छूटता नहीं 

है एक पल जो बीतता नहीं 

वक़्त गुज़रता जाता है 

पर समय बीतता नहीं ।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं 

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं ।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं 

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं ।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

एक दर है जो छूटता नहीं है

 एक दर है जो छूटता नहीं है

है एक पल जो बीतता नहीं है

समय गुज़रता जाता है

पर समय बीतता नहीं है।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं है

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं है।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं है

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Sunday, February 8, 2026

इश्क़ पर वसंत आया है

 इश्क़ पर वसंत आया है 

तुम्हें साथ ले आया है


फूलों की गंध में 

मिल चुकी है तुम्हारे 

लौट आने की खुशबू 


पपीहे ने फिर तुम्हे 

पुकारा है 

तुम्हारी याद ने घर आंगन

महकाया है

तुम्हारे लौट आने का 

मौसम आया है


यह हवा ने फिर 

किवाड़ खटखटाएं है

तुम्हारी पदचाप सुनने को

सरसों के खेत 

लहराएं हैं

तुम्हारे आने का मौसम 

लौट आया है


गांव घर की गलियों में

रंग संवर आया है 

तुम्हें फिर 

फाल्गुन ने पैगाम 

भिजवाया है 

तुम्हारे लौटने का 

मौसम फिर आया है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, January 21, 2026

प्रश्न मत करो

 आस्था पर प्रश्न मत करो

हिल जाती है 

व्यवस्था पर प्रश्न मत करो

चरमरा जाती है

शासन पर प्रश्न मत करो

ढह जाता है

तंत्र पर प्रश्न ना करो 

टूट जाता है

संभाल कर रखो 

अपना पेट बार बार

भूख से बिलबिला जाता है।

आदत डाल लो

अब मरने की

प्रश्नों से आज भी सिंहासन

डोल जाता है।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Sunday, January 18, 2026

मेरे अस्तित्व के खांचे में

 मेरे व्यक्तित्व खांचे में

ईश्वर रंग भर रहा है

उसकी कूची पैनी है

चुभती है लेकिन रंग

सारे पक्के हैं 

आत्म में उतरते।

कभी लगता है रूंध रहा है

अपनी चाकी पर

और तपा रहा है 

अपनी ही आंच में 

मैं पक्की और पक्की 

होती जा रही हूं ।


पीड़ा शायद उसकी 

छैनी है 

यह मानते हुए 

मैं हर अनुभव जीती 

जाती हूं

उस पूर्णता की उम्मीद में 

जीवन के सब 

प्रहार झेलती जा रही हूं।


ईश्वर है ?नहीं है?

निरुत्तर हूं और 

कभी कभी बस यह 

उम्मीद ही जैसे ईश्वर है

मुझे हर उगता सूरज 

देखना है 

हर ढलते सूरज को विदा देनी है

और 

इसी पीड़ा में खुद को

तराशते हुए होम 

हो जाना है।।

यह मानते हुए कि

ईश्वर मेरे अस्तित्व के 

खांचे में रंग भर रहा है।


मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू