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Sunday, February 8, 2026

इश्क़ पर वसंत आया है

 इश्क़ पर वसंत आया है 

तुम्हें साथ ले आया है


फूलों की गंध में 

मिल चुकी है तुम्हारे 

लौट आने की खुशबू 


पपीहे ने फिर तुम्हे 

पुकारा है 

तुम्हारी याद ने घर आंगन

महकाया है

तुम्हारे लौट आने का 

मौसम आया है


यह हवा ने फिर 

किवाड़ खटखटाएं है

तुम्हारी पदचाप सुनने को

सरसों के खेत 

लहराएं हैं

तुम्हारे आने का मौसम 

लौट आया है


गांव घर की गलियों में

रंग संवर आया है 

तुम्हें फिर 

फाल्गुन ने पैगाम 

भिजवाया है 

तुम्हारे लौटने का 

मौसम फिर आया है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, January 21, 2026

प्रश्न मत करो

 आस्था पर प्रश्न मत करो

हिल जाती है 

व्यवस्था पर प्रश्न मत करो

चरमरा जाती है

शासन पर प्रश्न मत करो

ढह जाता है

तंत्र पर प्रश्न ना करो 

टूट जाता है

संभाल कर रखो 

अपना पेट बार बार

भूख से बिलबिला जाता है।

आदत डाल लो

अब मरने की

प्रश्नों से आज भी सिंहासन

डोल जाता है।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Sunday, January 18, 2026

मेरे अस्तित्व के खांचे में

 मेरे व्यक्तित्व खांचे में

ईश्वर रंग भर रहा है

उसकी कूची पैनी है

चुभती है लेकिन रंग

सारे पक्के हैं 

आत्म में उतरते।

कभी लगता है रूंध रहा है

अपनी चाकी पर

और तपा रहा है 

अपनी ही आंच में 

मैं पक्की और पक्की 

होती जा रही हूं ।


पीड़ा शायद उसकी 

छैनी है 

यह मानते हुए 

मैं हर अनुभव जीती 

जाती हूं

उस पूर्णता की उम्मीद में 

जीवन के सब 

प्रहार झेलती जा रही हूं।


ईश्वर है ?नहीं है?

निरुत्तर हूं और 

कभी कभी बस यह 

उम्मीद ही जैसे ईश्वर है

मुझे हर उगता सूरज 

देखना है 

हर ढलते सूरज को विदा देनी है

और 

इसी पीड़ा में खुद को

तराशते हुए होम 

हो जाना है।।

यह मानते हुए कि

ईश्वर मेरे अस्तित्व के 

खांचे में रंग भर रहा है।


मनीषा वर्मा

#गुफ़्तगू

Sunday, January 11, 2026

प्रश्नोत्तर

 मैं पूछना चाहती हूं

नदी से क्यों चुप सी बहती है?

पूछना चाहती हूं पहाड़ से 

क्यों दर्प से तना है ?

पूछना है मुझे समुद्र से 

क्यों इतना बेचैन है?

ओर पूछना है इस धरती से 

क्यों सब सहती है?


पूछना तो मुझे यह भी है

ईश्वर से

निष्पक्ष क्यों नहीं है तुम्हारा न्याय?

किंतु परंतु से हट कर 

चुप है ईश्वर 

निरुत्तर खड़ा है 

एक स्वर्णद्वार के परे 

शायद अपनी ही कृति पर अचंभित 

अचकचाया सा प्रश्नों से बचता हुआ।

आखिर कहे भी तो क्या?

शायद उसने भी नहीं सोचा था 

सूर्य और चन्द्र के बीच 

मन का इतना गहन अंधेरा होगा।

और मैं

एक प्रश्न चिन्ह सी

हाशिए पर खड़ी हूं

निरुत्तर

निःतांत अकेली।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Monday, December 29, 2025

मुझे तो चलना ही है अकेले ही

 मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले  ही 

तुमने क्योंकर पुकार लिया यूँही 

किसी अतीत के कोने से आकर दे दी दस्तक 

मेरे मन के अंधेरो पर अपने उजालों  की 


मेरे बिखरे मन को तुम आज क्यों समेटना चाहते हो 

अपने वक्ष में क्यों मेरा वजूद बसाना चाहते हो 

क्यों जकड़ना चाहते हो मुझे अपने बाज़ुओं में 

मैं तो रो ही रही थी बरसों से हर बरसात में 

तुम किसलिए  अब मुझे अपना कांधा  देना चाहते हो 

ओ! आनेवाले अजनबी तुम क्यों मुझसे परिचित होना चाहते हो 

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले 

तुम क्यों मेरा साथ देना चाहते हो 


लौट जाओ , 

यहाँ बहुत कंटक है मन के भीतर 

इनमे कैसे फूल खिलेंगे

मन में जो अब संवरते नही उन बेरंग मौसमों में कैसे रंग भरेंगे 

तुम  थाम  तो रहे हो मेरा हाथ हम कैसे संग चलेंगे 

तुम्हारे रास्तों पर फुलवारियां है 

मेरे रास्ते बीहड़ो की ओर जातें  हैं 

तुम लौट जाओ यहीं से 

मेरे पास पाने को कुछ भी नही है 

और तुम्हारे पास खोने को है बहुत कुछ 

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले 

मनीषा