बहुत उम्र हो गई थी बापू की
इसलिए अब उनकी खटिया आंगन में लगा दी गई।
आते जाते सब प्रणाम करते कुछ नजर बचा के गुजरना भी चाहते तो बापू आवाज लगा कर बुला लेते और फिर कुछ रटा रटाया संवाद करना मजबूरी हो जाता था।
बापू अपने समय में खूब मिलनसार, प्रभावकारी व्यक्ति थे। खूब दार्शनिक बाते करते और इधर उधर सभाओं में बुलाए जाते थे।
अब अकेले बैठे बैठे उन्हीं दिनों को याद करते थे। बोलते बच्चा वो ज़माना और ही था।
बापू को इस ज़माने से भी कोई शिकायत नहीं थी बस अकेलापन सालता। अब उन्हें सुनने का, उनसे बाते करने का किसे समय था। बेटे बहु सब अपने काम में व्यस्त। बच्चे कभी कभी मज़े लेने के लिए मोबाइल का कैमरा ऑन कर के पूछते बापू अपने भगत सिंह को देखा है क्या? और इंदिरा जी ने जब इमरजेंसी लगाई थी तो कहां थे आप?
बापू उन्हें बताने लगते और बच्चे छू मंतर। उन्हें कहां सुनना था वो तो बस छेड़ने आते। बापू कभी कभी लाठी से टेक लगा दुआरे तक जाते कि शायद कोई आता हो उनसे भी मिलने।
बुढ़ापा सच में बड़ी बुरी बला है वक्त के आइने में बस झुर्रिया ही मिलतीं हैं।
अब सुना है घर के आंगन पर छत डालनी है। धूप बहुत आने से कमरे गर्म हो जाते हैं। बारिश की भी दिककत और सबसे बड़ी जगह की किल्लत। एक कमरा और चाहिए आखिर परिवार फैल रहा है और है तो बापू का ही परिवार। सबको अपनी जगह चाहिए। बापू की खाट अब हटानी ही होगी ।उन्हें कोने वाला कमरा दे देंगे। वैसे भी आते जाते हरेक को टोकते रहते हैं। कितना कोई बचे उनसे।
मनीषा वर्मा
#गुफ्तगू