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Friday, October 2, 2026

बापू की खाट

बहुत उम्र हो गई थी बापू की

इसलिए अब उनकी खटिया आंगन में लगा दी गई।

आते जाते सब प्रणाम करते कुछ नजर बचा के गुजरना भी चाहते तो बापू आवाज लगा कर बुला लेते और फिर कुछ रटा रटाया संवाद करना मजबूरी हो जाता था।

बापू अपने समय में खूब मिलनसार, प्रभावकारी व्यक्ति थे। खूब दार्शनिक बाते करते और इधर उधर सभाओं में बुलाए जाते थे। 

अब अकेले बैठे बैठे उन्हीं दिनों को याद करते थे। बोलते बच्चा वो ज़माना और ही था। 

बापू को इस ज़माने से भी कोई शिकायत नहीं थी बस अकेलापन सालता। अब उन्हें सुनने का, उनसे बाते करने का किसे समय था। बेटे बहु सब अपने काम में व्यस्त। बच्चे कभी कभी मज़े लेने के लिए मोबाइल का कैमरा ऑन कर के पूछते बापू अपने भगत सिंह को देखा है क्या?  और इंदिरा जी ने जब इमरजेंसी लगाई थी तो कहां थे आप?

बापू उन्हें बताने लगते और बच्चे छू मंतर। उन्हें कहां सुनना था वो तो बस छेड़ने आते। बापू कभी कभी लाठी से टेक लगा दुआरे तक जाते कि शायद कोई आता हो उनसे भी मिलने। 

बुढ़ापा सच में बड़ी बुरी बला है वक्त के आइने में बस झुर्रिया ही मिलतीं हैं।

अब सुना है घर के आंगन पर छत डालनी है। धूप बहुत आने से कमरे गर्म हो जाते हैं। बारिश की भी दिककत और सबसे बड़ी जगह की किल्लत। एक कमरा और चाहिए आखिर परिवार फैल रहा है और है तो बापू का ही परिवार। सबको अपनी जगह चाहिए। बापू की खाट अब हटानी  ही होगी ।उन्हें कोने वाला कमरा दे देंगे। वैसे भी आते जाते हरेक को टोकते रहते हैं। कितना कोई बचे उनसे।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

बापू तुम होते तो क्या कहते?

बापू तुम होते तो क्या कहते?

शायद धरनो से तुम्हारे 

हम सब परेशान होते

कहते बापू नहीं चाहिए 

इतनी तुम्हारी ईमानदारी 

यह सत्य यह न्याय तो मिथक हैं 

हम पूछते पार्किंग है नहीं गाड़ी की 

बापू पड़ोसी से कैसे प्रेम करें 

यह कचरे की लड़ाई बताओ बापू 

कैसे खत्म करें

हम तुम्हें कहते बापू आदर्शों से

असल जिंदगी नहीं चलती

ईमानदारी से थाली में रोटी

नहीं मिलती बापू

यह बराबरी की बाते तो स्वप्न है

तुम पर नहीं बनती कोई फिल्म 

तुम अखबार के तीसरे पन्ने की 

कोई खबर भर  होते

अपने आचरण से किसी दिन 

तुम भी सभागार से उठा लिए गए होते

सत्ता के लिए सिरदर्द होते 

प्रजा के लिए हास्य पात्र होते

शायद किसी कारागार में बंद होते

केस की सुनवाई तुम्हारी भी नहीं होती

तारीख के इंतज़ार में होते 

बापू तुम होते तो हम भी 

तुमसे नाराज होते। 

तब तुम क्या कहते?


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, September 30, 2026

बातें रह जाती हैं

बातें रह जाती हैं चंद मुलाकाते रह जाती हैं

उम्र फिसल जाती है हाथों से 

बस यादें रह जाती हैं 


कुछ पुकार के नाम रह जाते हैं 

दोस्तों के बीच लगे ठहाके रह जाते हैं

अभी तो यहीं थे

कल ही तो मिले थे 

बस बातें रह जाती हैं 


कोई आँचल गीला सा रह जाता है

तन के कपड़े मन के बोल रह जाते हैं

एक अधूरी गुनगुनाई धुन

रह जाती है 

एक चश्मा एक रुमाल एक कलम रह जाती है

वक्त गुज़र जाता है 

एक रुकी सी घड़ी रह जाती है


उम्र फिसल जाती है हाथों से 

बस यादें रह जाती हैं 


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Friday, September 25, 2026

मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे लिए एक प्रश्नचिन्ह है।

 जब मेरा अस्तित्व ही एक प्रश्नचिन्ह हो।

तुम्हें सिर्फ दिखते हैं देह के कुछ हिस्से 

और तुम्हारा पूर्ण ब्रह्मांड 

उसी पर केन्द्रित रह जाता है।

कभी भोग्या कभी वस्तु कभी सम्मोहन का पात्र बना देते हो।

जिस देह से ईश्वर और पैगम्बर जन्मे 

अरस्तू से आइंस्टाइन तक, जिस देह ने गढ़े 

वही देह एक हाशिये पर मेरे परिचय को सरका देती है।

तुम्हारे लिए मेरा अस्तित्व एक जटिल प्रश्न है।

कभी मेरी भावनाएं तुम्हारे ओछेपन का निशाना बनती हैं 

मेरी दुःख मेरी पीड़ा तुम्हारे लिए परिहास का विषय है।

मेरी देह तुम्हारे लिए विकार वस्तु मात्र रह जाती है।

मेरी सफलता असफलता का मापदान बनती है यह देह 

तुम्हारी नज़रों से बचाऊँ या तुम्हारे मचलते हाथों से 

कितने पर्दे कितनी सांकले लगाऊँ अपनी देह के आगे 

कि तुम्हारी मचलती लालसा से छिपा सकूं अपनी देह।

जब मेरी देह, मेरा अस्तित्व ही एक प्रश्नचिन्ह हो।

बताओ कैसे कहाँ रखूँ अपनी देह 

कितने तालों में कितनी बंद सांकलो के पीछे 

जो ईश्वर को पाने का मार्ग तुम्हारे लिए सरल हो।

क्योंकि 

मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे लिए एक प्रश्नचिन्ह है।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Wednesday, September 16, 2026

तुम्हें याद हो शायद

तुम्हें याद हो शायद 

एक फर्श था कुछ गुलाबी 

उसे कितना घिसा था 

एक पत्थर से हम दोनों ने

थोड़ा और चमकाने के लिए।


तुम्हें याद हो शायद

एक दीवार पर आटा घोल कर 

चिपका दिए थे लक्ष्मी गणेश 

और एक प्रार्थना 

लक्ष्मी जी सदा सहाय हों।


तुम्हें याद हो शायद

एक वो दरवाज़ा 

जिसके पीछे सीढ़ियां 

छत तक जाती थीं 

वहीं लटकता था 

एक नज़र बट्टू।।


तुम्हे याद हो शायद

एक छत थी जिस पर

 सफेद चादरें डाल

रात भर गिनते थे हम तारे।।


तुम्हें याद हो शायद

एक कुर्सी थी बाबा की

जिस पर झूल झूल 

 सारे सबक किए थे याद ।।


तुम्हें याद हो शायद

एक आखिरी दिवाली

जिस में हमने कर दी थी 

आसमान से ले कर धरती तक 

कितनी रोशनी ।।


तुम्हें याद हो शायद

एक वो  तुम्हारा आखिरी गीत 

जिसकी आवाज़ अब उस 

घर में ठहर सी गई है।।


तुम्हें याद हो शायद 

आगे जाने के लिए 

हम कितना कुछ 

पीछे छोड़ आए हैं ।।


तुम्हें याद हो शायद...


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

Anuraag Verma