बातें रह जाती हैं चंद मुलाकाते रह जाती हैं
उम्र फिसल जाती है हाथों से
बस यादें रह जाती हैं
कुछ पुकार के नाम रह जाते हैं
दोस्तों के बीच लगे ठहाके रह जाते हैं
अभी तो यहीं थे
कल ही तो मिले थे
बस बातें रह जाती हैं
कोई आँचल गीला सा रह जाता है
तन के कपड़े मन के बोल रह जाते हैं
एक अधूरी गुनगुनाई धुन
रह जाती है
एक चश्मा एक रुमाल एक कलम रह जाती है
वक्त गुज़र जाता है
एक रुकी सी घड़ी रह जाती है
उम्र फिसल जाती है हाथों से
बस यादें रह जाती हैं
मनीषा वर्मा
#गुफ्तगू
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