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Tuesday, February 7, 2017

हाल जो पूछ लिया

ज़रा सा हाल जो पूछ लिया
और मन गुनने लगा
सुनहरी धूप  के रेशों में
कुछ बुनने लगा
बारिश के गीतों में
स्वप्न सुनने लगा
ज़रा सा हाल जो पूछ लिया

धड़कनें  सी थमने लगी
साँसे रुकने सी लगी
रोम रोम गुनगुनाने लगा
 ज़रा सा हाल जो पूछ लिया

मनीषा 

Friday, February 3, 2017

ईश्वर





पूज्य भी अपूज्य हो जाता है
खंडित हो तो ईश्वर भी

बेघर हो जाता है
बहुत मान से आई थी जो मूरत
देख पवित्रता ली थी जो चुनर
वटवृक्ष तले आश्रय पाता है
आरती का दीप जब बुझ जाता है
महकता गूगल जो राख हो जाता है
किसी उदास मुंडेर से ढुलकाया 
जाता है
चढ़ देवालय पर जब पुष्प सूख जाता है
गहन अंधेरे में रास्ते की गर्द हो जाता है
खंडित हो तो ईश्वर भी 
बेघर हो जाता है
मनीषा

Wednesday, February 1, 2017

जिस आँगन में

जिस आँगन में खेली मैं उस आंगन को कैसे जर्जर होता देखूँ
जिस ड्योढ़ी पर दीप जलाए  उस को कैसे ढहता देखूँ

सूने सूने टूटे दर्पण में तेरा मेरा बीता  बचपन देखूँ
धूल भरे उन  दीवारों पर अतीत का हर इक पन्ना देखूँ
दरवाज़े की दरारों  से झाँकता  माँ से अपना होता झगड़ा देखूँ
बिस्तर पर बिछी उसी पुरानी  चादर पर अब तक बैठा
वो हम सबका मुस्कुराता लम्हा देखूँ

जिस आँगन में खेली मैं उस आंगन को कैसे जर्जर होता देखूँ
जिस ड्योढ़ी पर दीप जलाए  उस को कैसे ढहता देखूँ

उस आंगन में अब पसरा वो गर्द भरा तन्हा सन्नाटा देखूँ
पीछे आँगन  में  चुप पड़ी वो धूप  का टुकड़ा देखूँ
अल्मारी  में बन्द पड़ी वो भाभी की चूड़ियाँ  देखूँ
बन्द पड़े उस टीवी के रिमोट पर अब तक चढ़ी  पन्नी से
महकती  वो तेरी मेरी खींचातानी देखूँ

जिस आँगन में खेली मैं उस आंगन को कैसे जर्जर होता
जिस ड्योढ़ी पर दीप जलाए  उस को कैसे ढहता देखूँ

टूटती जा रही छत से क्षितिज पर डूबता सूरज देखूँ
ठंडी चादरों पर  वो तारों से की जो हर बात पुरानी देखूँ
लोहड़ी की ठंडी पड़ी राख में बस के रह गई जो
पुरानी  वो  ढोलक की थाप  देखूँ

जिस घर से उठी थी मेरी डोली , जिस घर बजी तेरी शहनाई
उस कैसे मैं ढहता देखूँ
जिस आंगन में बांधे वन्दनवार , जिस दरवाज़े सजाई रंगोली
उसे कैसे मैं जर्जर होता देखूँ
जिस आँगन में खेली मैं उस आंगन को कैसे जर्जर होता देखूँ
जिस ड्योढ़ी पर दीप जलाए  उस को कैसे ढहता देखूँ

मनीषा वर्मा
#गुफ्तगू 

Wednesday, December 7, 2016

माँ ने सब सिखाया

अंगुली पकड़ चलना सिखाया
रोते रोते हँसना सिखाया
पाँव के झूले पर बोलना सिखाया
माँ ने सब सिखाया
सिर्फ अपने बिन जीना नहीँ सिखाया
लोरी सुना सुना सोना सिखाया
कहानी कह कह कर खाना सिखाया
तो चपत लगा कर बाल गूथना सिखाया
कभी प्यार से तेल लगाना बताया
माँ ने सब सिखाया
सिर्फ अपने बिन जीना नहीँ सिखाया

बहला फुसला कर पढ़ना सिखाया
इक इक अक्षर बना लिखना सिखाया
चोरी से आँख दिखा कर से आदर सिखाया
माँ ने सब सिखाया
सिर्फ अपने बिन जीना नहीँ सिखाया
चूड़ी की खनक ताल पर रोटी बेलना सिखाया
हल्दी नमक मिर्च का सही अंदाज़ सिखाया
बन अन्नपूर्णा मिलता है जो सन्तोष सिखाया
माँ ने सब सिखाया
सिर्फ अपने बिन जीना नहीँ सिखाया
जीवन संघर्षों से जूझना सिखाया
हार कर फिर फिर फिर जीतना सिखाया
मन का हौसला अपने ऊपर विश्वास सिखाया
अहं से ऊपर होता है सबसे प्यार सिखाया
माँ ने सब सिखाया
सिर्फ अपने बिन जीना नहीँ सिखाया
साँझ ढले तुलसी को जल घर को लौ देना सिखाया
मेरे विद्रोही मन को व्रत उपवास रीति रिवाज़ सिखाया
कभी प्यार से कभी डाँट से दुनियावी व्यहार सिखाया
माँ ने सब सिखाया
सिर्फ अपने बिन जीना नहीँ सिखाया
मनीषा


Monday, August 15, 2016

नेताजी

नेताजी से पूछ बैठा
पंद्रह अगस्त की पूर्व सन्ध्या पर एक पत्रकार
नेताजी आपके राज में विकास की स्थिति बतलाइये
मुस्कुरा के बोले नेताजी
दो ही बरस में मेरे घर में हुआ  सुपुत्र विकास
और उसके एक ही साल में आई है पुत्री
नाम रक्खा है उसका तरक्की
आप अगले प्रश्न पर आइए
पूछा फिर  ज़रा ज़ोर दे कर वह
नेताजी  प्रदेश में
आपने क्या कार्य किया कुछ बतलाइए
बोले फिर नेताजी अरे बुरबक
ये जो 50  किलोमीटर सड़क बनवाई
कई पुल  बनवाए दिखता नहीं तुझे
पत्रकार ने फ़िर उछाला  एक तंज
जी वही सड़क नेताजी जिस पर अभी हुआ है
एक कन्या के साथ दुःसाहस ?
नेताजी ! ज़रा यहाँ लॉ  और आर्डर की
स्थिति पर नज़र दौड़ाइए कुछ बतलाइए
नेताजी बोले एक आध किस्सा तो इतने
बड़े प्रदेश में  चलता है
बाकि घर में लॉ ही नही
आर्डर भी
मेरी श्रीमती का ही चलता है
मनीषा