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Tuesday, April 8, 2014

रोज़

रोज़ सुबह एक इरादा करती हूँ 
किरणों  से एक वादा करती हूँ 
दिन उगता है रंजिशे लिए और तपिश से लड़ती हूँ 
शाम के ढलते ढलते भीतर तक झुलस जाती  हूँ  
जब रात गहराती है और आंगन में चाँद को पाती हूँ 
मेरी दिन भर की थकन तेरी बातों में भूल जाती हूँ 
मनीषा

कुछ पंक्तियाँ


तेरे और मेरे जूनून में फर्क इतना सा है 
तेरे पास तेरी दुनिया है और तू मेरी दुनिया है 

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कैसे  विश्वास करूं
छिन्न भिन्न हो चुका  है जो
उसका फिर कैसे पुन: निर्माण करूं

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बार बार वही  बात करती हूँ 
मैं अपने भीतर के सन्नाटो  से डरती  हूँ 
कैसे भूल जाऊँ  आप बीती 
अब तेरे प्यार से भी मैं डरती  हूँ 
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वक्त बदल जाए तो मौसम बदल जाते हैं 
लोग बदल जाते हैं अपने पराए बदल जाते हैं 
छोड़ इन बातों वादों और इरादों को 
मैंने देखा है कैसे सुबह और शाम के मंज़र बदल जाते हैं
मनीषा

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दो नन्हे हाथों  से थाम रख़ा  है ज़िंदगी ने मुझे 
वरना मौत ने तो भेजे हैं बेइंतहा पैग़ाम  मुझे 

Thursday, April 3, 2014

मौसम बहार का

फिर खिले होंगे  गुलाब उस छत पर
फिर आया होगा मौसम बहार  का
तेरे  आंगन
झूले की वो पींग एक मेरे नाम की
एक तेरे नाम की
हवा छू  कर  हिलाती तो होगी वो शाख
आम की
सखि  तू भी तो छिपाती होगी
मुस्कुरा कर नमी आँख की
मनीषा 

कुछ अधूरी

कुछ  जी गई  कुछ मर गई मैं
फिर थोड़े थोड़े हिस्सों में बंट गई मैं
तुझसे मिल कर जो जुदा  हुई मैं
तो कुछ तो पूरी  रही कुछ अधूरी रही मैं
मनीषा 

देखो पिया

दिल में छिपा सको नाम मेरा तो छिपा लेना
मन में बसा सको प्यार मेरा तो बसा लेना

ना नज़र आऊँ  मैं आँखों में तुम्हारी
कोई नज़र मिलाए तो तुम पलक गिरा देना।

खिले यदि तन्हाई में कभी याद मेरी
तो किसी किताब में उस खुश्बू को दबा देना।

कभी चलते चलते साथ अपने कदम पाओ मेरे
तो होंठो पर खिलती मुस्कान  वहीं  छिपा लेना।

देखो पिया यदि कोई पूछे किसे खोजती हैं नज़रे
तो कहीं नाम मेरा तुम न बता देना।

वक्त  यदि मिला दे किसी मोड़ पर हमें
तब हाथ अपना तुम भी आगे बढ़ा देना।

मनीषा