मेरे व्यक्तित्व खांचे में
ईश्वर रंग भर रहा है
उसकी कूची पैनी है
चुभती है लेकिन रंग
सारे पक्के हैं
आत्म में उतरते।
कभी लगता है रूंध रहा है
अपनी चाकी पर
और तपा रहा है
अपनी ही आंच में
मैं पक्की और पक्की
होती जा रही हूं ।
पीड़ा शायद उसकी
छैनी है
यह मानते हुए
मैं हर अनुभव जीती
जाती हूं
उस पूर्णता की उम्मीद में
जीवन के सब
प्रहार झेलती जा रही हूं।
ईश्वर है ?नहीं है?
निरुत्तर हूं और
कभी कभी बस यह
उम्मीद ही जैसे ईश्वर है
मुझे हर उगता सूरज
देखना है
हर ढलते सूरज को विदा देनी है
और
इसी पीड़ा में खुद को
तराशते हुए होम
हो जाना है।।
यह मानते हुए कि
ईश्वर मेरे अस्तित्व के
खांचे में रंग भर रहा है।
मनीषा वर्मा
#गुफ़्तगू
