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Sunday, January 11, 2026

प्रश्नोत्तर

 मैं पूछना चाहती हूं

नदी से क्यों चुप सी बहती है?

पूछना चाहती हूं पहाड़ से 

क्यों दर्प से तना है ?

पूछना है मुझे समुद्र से 

क्यों इतना बेचैन है?

ओर पूछना है इस धरती से 

क्यों सब सहती है?


पूछना तो मुझे यह भी है

ईश्वर से

निष्पक्ष क्यों नहीं है तुम्हारा न्याय?

किंतु परंतु से हट कर 

चुप है ईश्वर 

निरुत्तर खड़ा है 

एक स्वर्णद्वार के परे 

शायद अपनी ही कृति पर अचंभित 

अचकचाया सा प्रश्नों से बचता हुआ।

आखिर कहे भी तो क्या?

शायद उसने भी नहीं सोचा था 

सूर्य और चन्द्र के बीच 

मन का इतना गहन अंधेरा होगा।

और मैं

एक प्रश्न चिन्ह सी

हाशिए पर खड़ी हूं

निरुत्तर

निःतांत अकेली।।


मनीषा वर्मा 


#गुफ़्तगू

Monday, December 29, 2025

मुझे तो चलना ही है अकेले ही

 मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले  ही 

तुमने क्योंकर पुकार लिया यूँही 

किसी अतीत के कोने से आकर दे दी दस्तक 

मेरे मन के अंधेरो पर अपने उजालों  की 


मेरे बिखरे मन को तुम आज क्यों समेटना चाहते हो 

अपने वक्ष में क्यों मेरा वजूद बसाना चाहते हो 

क्यों जकड़ना चाहते हो मुझे अपने बाज़ुओं में 

मैं तो रो ही रही थी बरसों से हर बरसात में 

तुम किसलिए  अब मुझे अपना कांधा  देना चाहते हो 

ओ! आनेवाले अजनबी तुम क्यों मुझसे परिचित होना चाहते हो 

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले 

तुम क्यों मेरा साथ देना चाहते हो 


लौट जाओ , 

यहाँ बहुत कंटक है मन के भीतर 

इनमे कैसे फूल खिलेंगे

मन में जो अब संवरते नही उन बेरंग मौसमों में कैसे रंग भरेंगे 

तुम  थाम  तो रहे हो मेरा हाथ हम कैसे संग चलेंगे 

तुम्हारे रास्तों पर फुलवारियां है 

मेरे रास्ते बीहड़ो की ओर जातें  हैं 

तुम लौट जाओ यहीं से 

मेरे पास पाने को कुछ भी नही है 

और तुम्हारे पास खोने को है बहुत कुछ 

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले 

मनीषा

कितनी नफरतें बो रहे हैं

कितनी नफरतें बो रहे हैं 

कौन सी फसल काटेंगे ?


वे बेनाम लोग 

वेश बदल बदल कर 

इस ज़मीं पर गिरा हुआ

सिर्फ लहू मांगेंगे।।


चीख चीख कर

मचा देंगे ये कोहराम

तुमसे सिर्फ तुम्हारी

चुप्पी मांगेंगे ।।


इनके हाथों में हैं

खंजर और दारातियां 

तुम्हारे सीने में 

यह डर उतारेंगे।।


कर देंगे हवा ज़हरीली 

पानी में विष मिला देंगे 

तुमसे यह सिर्फ 

झुके सिर मांगेंगे।।


दाम दे कर खरीद लेंगे 

वो सारे नामानिगार 

वो भर भर कर पुलिंदे 

झूठ बाँचेंगे।।


उजाड़ कर तुम्हारे खेत

और तुम्हारी बस्तियां

तुमसे ही तुम्हारी 

पहचान मांगेंगे 


तुम इन आंधियों 

के बीच दीप सा जलना

तोड़ कर चुप्पी

प्रेम और प्रीत लिखना।।


उठा कर शीश

अपने डर से मिलना

अपनी हिम्मत 

अपने लहू से

अपनी वर्जना लिखना।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ़्तगू

Monday, December 22, 2025

आज मन बेहद उदास है

 आज मन बेहद उदास है

शायद कोई ख़्याल आस पास है

मन को रूँधू तो शायद बताए 

किस कमी का यह अहसास है।।


मौसम भी बुझा बुझा सा है

साल की उम्र भी ढल सी गई है

हवा में घुला एक खुश्क सा पैगाम है

बेतरतीब सा इस रात का मिजाज़ है।।

आज मन बेहद उदास है

मनीषा वर्मा

#गुफ्तगू




मैं कुछ देर आंखे बंद कर के तुम्हें सोचना चाहती हूं

 मैं कुछ देर आंखे बंद कर के तुम्हें सोचना चाहती हूं 

मन ही मन मुस्काते कुछ गुनगुनाना चाहती हूं 

खिड़की से जो चांद नज़र नहीं आता

उसी की चांदनी में तुम्हें पाना चाहती हूं

कभी तुमसे रूठना कभी तुम पर इतराना चाहती हूं

 यह हमारे बीच आए तहज़ीबो और दायरों के फासले 

मिटाना चाहती हूँ

बस कुछ देर आँखें मूंदने से पहले 

एक बार फिर तुम्हें तुम ही से चुराना चाहती हूँ

मैं कुछ देर तुम्हें सोचना चाहती हूं।।

यह एक पल इतना मुश्किल होगा कभी

इस बात पर गौर करना चाहती हूं

इक उम्र में बस यही था मेरा काम

दिन रात बस तुम्हें ले कर ओढ़ना बिछाना

अपनी हथेलियों पर तुम्हारा नाम लिख कर 

बंद मुट्ठी में तुम्हें संग साथ ले आना 

आज बस उसी एक पल में लौटना चाहती हूँ 

बस कुछ देर आँखें मूंदने से पहले 

एक बार तुम्हें सोचना चाहती हूँ 

तुम्हारे  और मेरे नाम के वो दो अक्षर 

सहेजकर बस एक बार फिर पुकारना चाहती हूं।

मैं कुछ देर तुम्हें सोचना चाहती हूं।।

मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू