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Tuesday, September 8, 2026

एक दर है जो छूटता नहीं है

 एक दर है जो छूटता नहीं है

है एक पल जो बीतता नहीं है

समय गुज़रता जाता है

पर समय बीतता नहीं है।।


उसी मुहाने पर खड़े हैं 

जहाँ से कोई गुजरता नहीं है

कोई बात तो है सबके ज़हन में

पर कोई पूछता नहीं है।।


इस फ़िज़ा में एक चुप सी लगी है

कोई अब हमें क्यों पुकारता नहीं है

तेरे शहर में हम हो गए मुसाफ़िर

कोई यहां अब अपना लगता नहीं है।।


मनीषा वर्मा 

#गुफ्तगू

4 comments:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में  मंगलवार 14 सितंबर, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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